ज़िंदगी के कुछ मीठे,कुछ खट्टे कुछ तीखे अनुभव से उपजी बातों को सहेजने का एक अकिंचन सा प्रयास .....!

Monday, 8 August 2016

सत्य...!

कहाँ - कहाँ नही ढूंढा तुम्हें
मंदिरों में,मस्जिदों में,गिरजाघरों में
और-और इबादत गाहों में जाकर
पुकारा तुम्हें...!
जोर से आवाज़ दी .....
हर बार मेरी आवाज़
इबादतगाहों के गुम्बदों में गूँजती रही 
दीवारों से टकराती रही
शून्य में विलीन होती रही
किन्तु नही मिला तुम्हारा कोई भी सुराग !
हारकर / थककर
दिल ने पुकारा  तुम्हें मौन स्वर” में
अचरज.....!!!!
इस बार ना तो मेरी आवाज़ कही गूंजी
ना दीवारों से टकराई
और ना ही शून्य में विलीन हुई
बल्कि प्रतिउत्तर में
सुनाई पड़ी तुम्हारी मरियल सी
थर्राथराताती हुईं अनुगुंजित आवाज़
मैंने झाँककर देखा / अपने मन में...!
तुम स्वार्थ के भारी-भरकम  
चट्टान के नीचे दबे/ रिरितते हुये मिले

ओ आदि सत्य .... !! - चुन्नी <3 :) 

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