ज़िंदगी के कुछ मीठे,कुछ खट्टे कुछ तीखे अनुभव से उपजी बातों को सहेजने का एक अकिंचन सा प्रयास .....!

Wednesday, 22 June 2016

रहने दे ...!





ज़ीस्त है जब तक ये करम रहने दे
अनकहा है जो हमको भी कहने दे !
कुम्हलाये ही सही फिर भी फूल हैं,
कुचल देना पैरों तले भरम रहने दे !
बेसबब , बेअसर ,नाकाम ही सही ,
अहसासों का अनवरत चरम रहने दे !
हर कोना वीरान हैं हालात है बेरहम,
अज़मत होगी थोड़ा वहम रहने दे !
मौसम-ए-दहर में कब्ज़ा है ख़िज़ाँ का,
दिले चमन पर थोड़ा रहम रहने दे !! चुन्नी <3 :)











ज़ीस्त       = जींदगी / जीवन 
मौसम-ए-दहर = दुनियां का मौसम
ख़िज़ाँ       =  पतझड़   

Thursday, 9 June 2016

रीड़ की हड्डी से होकर
दौड़ जाती है/ सिहरन ....!!
स्तब्ध बस्ती की वीरान खामोशी में 

कभी- कभी अनायास ही गूंज उठती है,
बूटों के कदमताल की आवाज़ !!
और फिर से पसर जाता है/
मातमी सन्नाटा...!!
क्या घटा है यहाँ ?
निष्ठुर अधेरों के साथ
हवा हाँफने लगी है...!!
हताशा  में डूबी चंदनी
लहरों में कांपने लगी है !
अनायस ही सायरन की आवाज से
भंग हो जाती है मुर्दा शांति/
मुरझाई हुई है
बहुत उदास है
चाँद की कान्ति…!
तार पर बैठी अकेली चिड़िया
बेचैनी से तांक रही है
 इधर उधर
अधजले/गुंगवाते मकानों के भग्नावशेष/
मौत के तांडव की स्याह छाया/
बेतरतीबी से बिखर कर गाड़ा हो चुका
लाला रंग...!!
खौ
फजदा/ घुटी हुई मुर्दानी सिसकियां...!!
जिंदा लाशों  के बीच-
कुछ बदरंग व दहशत दा चेहरे /
चलो…! उठो तोडो
इस गहन हताशा को ...
पकड़ लो ...! जकड़ लो ...!!!
कही सूरज….

अस्त ना हो जाये
समूची मानवता  
ध्वस्त न हो जाये...!!!!- प्रेरक चुन्नी 

Saturday, 4 June 2016

तोड़ना जरूरी है /
बेहद जरूरी है !
तो तोड़ दिया जाये ...!
यही सबसे आसान है
जो लोग बडी
सहजता से कर लेते है...!
जोड़ना तो सीखा ही नही
क्योकि ये बहुत दुष्कर है
यही तो नही होता...!

               
 भोले तुझसा  
 फक्कड़नपन / सिखलादे
 भोले ...!! बता की कैसे
 हलाहल पिया जाता-
 भला कैसी विष कंठ में धारकर
 जिया जाता है ? – विषपायीचुन्नी <3