ज़िंदगी के कुछ मीठे,कुछ खट्टे कुछ तीखे अनुभव से उपजी बातों को सहेजने का एक अकिंचन सा प्रयास .....!

Wednesday, 22 June 2016

रहने दे ...!





ज़ीस्त है जब तक ये करम रहने दे
अनकहा है जो हमको भी कहने दे !
कुम्हलाये ही सही फिर भी फूल हैं,
कुचल देना पैरों तले भरम रहने दे !
बेसबब , बेअसर ,नाकाम ही सही ,
अहसासों का अनवरत चरम रहने दे !
हर कोना वीरान हैं हालात है बेरहम,
अज़मत होगी थोड़ा वहम रहने दे !
मौसम-ए-दहर में कब्ज़ा है ख़िज़ाँ का,
दिले चमन पर थोड़ा रहम रहने दे !! चुन्नी <3 :)











ज़ीस्त       = जींदगी / जीवन 
मौसम-ए-दहर = दुनियां का मौसम
ख़िज़ाँ       =  पतझड़   

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