ज़िंदगी के कुछ मीठे,कुछ खट्टे कुछ तीखे अनुभव से उपजी बातों को सहेजने का एक अकिंचन सा प्रयास .....!

Thursday, 9 June 2016

रीड़ की हड्डी से होकर
दौड़ जाती है/ सिहरन ....!!
स्तब्ध बस्ती की वीरान खामोशी में 

कभी- कभी अनायास ही गूंज उठती है,
बूटों के कदमताल की आवाज़ !!
और फिर से पसर जाता है/
मातमी सन्नाटा...!!
क्या घटा है यहाँ ?
निष्ठुर अधेरों के साथ
हवा हाँफने लगी है...!!
हताशा  में डूबी चंदनी
लहरों में कांपने लगी है !
अनायस ही सायरन की आवाज से
भंग हो जाती है मुर्दा शांति/
मुरझाई हुई है
बहुत उदास है
चाँद की कान्ति…!
तार पर बैठी अकेली चिड़िया
बेचैनी से तांक रही है
 इधर उधर
अधजले/गुंगवाते मकानों के भग्नावशेष/
मौत के तांडव की स्याह छाया/
बेतरतीबी से बिखर कर गाड़ा हो चुका
लाला रंग...!!
खौ
फजदा/ घुटी हुई मुर्दानी सिसकियां...!!
जिंदा लाशों  के बीच-
कुछ बदरंग व दहशत दा चेहरे /
चलो…! उठो तोडो
इस गहन हताशा को ...
पकड़ लो ...! जकड़ लो ...!!!
कही सूरज….

अस्त ना हो जाये
समूची मानवता  
ध्वस्त न हो जाये...!!!!- प्रेरक चुन्नी 

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