कविता...
अंतस से फूटती है
झर- झर झरना बनकर/
शब्द-शब्द ! छन्द – छन्द/
हौले – हौले / मंद – मंद –
कभी अनूठा व्दंद बनकर...!
भावनाओं की बाड़ में /
टूटन के आड़ में –
कविता उपजती है/
आंसुओं में/ मुस्कान में
मजदूरों की थकान में/
कही पर्वतों की ढला
नीले आसमान में !
गीतों में / गज़लों में /
लहलहाती हुई फसलों में !
नदियों में / खतों में /
खलिहानों में
कविता का दायरा बहुत बड़ा-
और विशाल है !!
कविता पर कविता /
ये अनुतरित सवाल है !!
जहां जति और वर्ग भेद है
जहां ईमान के दामन में छेद
है !!
सत्य अपाहिज और फेल है/
लूट/ खसोट का घिनौना खेल
है
वहाँ पर कविता तनकर खड़ी हो
जाती है !
अनायस सयानी
और बड़ी हो जाती है!!
ये विपरीत हालातो को
ये बेहतर रेट करती है/
प्रेमियों के संग डेट करती
है !!
दिल को संवेदनाओं से जोड़ती
है /
अंतस की जड़ता को तोड़ती है
...!
कभी ये दबे – कुचले
पीड़ितों की
ज़ुबान बन जाती है/
तो कभी शोषको के विरुद्ध
तीर - कमान बन जाती है,
अत्याचारीयों के खिलाफ...
कविता,,,,,,
विष्फोटक सामान बन जाती है
!! - चुन्नी <3 :)
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